अरे !!! क्या आप मुझसे मिलना चाहते हैं ???
"कि काश आज की छुट्टी मैंने घर पर सोते हुए या आराम से कोई फिल्म देखते हुए गुज़री होती तो कितना अच्छा होता".
तब मैं ये सोचता हूँ कि अरे जब जंगलों में मुझे ढूँढ़ते हुए भटकते हो तब ? अरे अभी तो मैं एक जगह ही खड़ा रहता हूँ अगर मैं सच में जंगल में होता तो ? पर वो जगह भी तो तुम्हारी वजह से मुझे छोडनी पड़ी. अब क्या मुझे इस घर से भी निकला जाएगा यहाँ से निकल कर मैं कहाँ जाऊंगा इस फ़िक्र में मुझे अब रातों में नींद भी नहीं आती मेरा क्या होगा समझ नहीं पा रहा हूँ.
आपके बच्चे मुझे देख कर खुश होते हैं और साथ ही आप भी कि बच्चों को मुझसे कोई डर नहीं है. ना मैं पंजा मार सकता हूँ, न दहाड़ सकता हूँ. मैं बस अपनी पथराई हुई आँखों से आप सबको चुप - चाप खड़ा देखता रहता हूँ. किसी को मुझसे मिलकर आश्चार्य होता है, तो कोई जोर से चिल्लाता है और कभी - कभी तो कोई सिर्फ मुस्कुरा कर रह जाता है. पर उसकी मुस्कुराहट से मुझे समझ में आ जाता है कि मैं बड़ा रजा बना घूमता था अब बस एक जगह खड़ा हूँ बिना हिले - डुले. आप लोगों को फोटो खिचवाने में कोई दिक्क़त ना हो इसीलिए ये सब करता हूँ.
अरे आप लोगों को मेरे साथ फोटो भी तो खिचवाने हैं एक यही बात तो है जो आप सभी को बहुत पसंद है और सभी में एक जैसी है छोटे से लेकर बड़े तक.
अब मुझे ना खाने की चिंता है, ना दहाड़ने की और ना ही इंसान की.
बस दिन रात आप लोगों को देखता रहता हूँ और सोचता रहता हूँ कि ये इंसान भी कितना अजीब है जब मैं जंगल मे रहता था तब भी इसे आराम नहीं थाऔर आज जब मैं यहाँ बैठा हूँ तब भी इसे आराम नहीं है.
जंगल में बिताये हुए दिनों कि यादें कभी कभी बहुत बेचैन कर देती हैं. कितने खूबसूरत दिन थे पर हाय री किस्मत इन इंसानों के हाथ चढ़ गया मुझे मारा सो मारा साथ ही मेरे जिस्म के हर हिस्से का पूरा उपयोग कर इसने मेरी खल में भूसा भर कर मेरी आँखों कि जगह कांच लगा कर यहाँ बैठा दिया और मेरे गोश्त को भून कर स्वाद से खा गया और उस पर तुर्रा ये की मेरे ही सामने मेरे गोश्त कि तारीफ करता है .मैं अगर इसका मांस कभी गलती से खा भी जाता था तो अफ़सोस होता था और एक ये है कि इसे किसी बात का अफ़सोस ही नहीं बेहया सारी शर्म को बेच कर खा गया है इंसान कहीं का.
कोई मेरे नाखूनों को गले में लटकाए घूम रहा है तो कोई मेरे रिश्तेदारों कि चमड़ी को घर में सजाये हुए है या उस पर बैठ रहा है. किसी किसी की चमड़ी के तो कपडे बनवा लिए जिन्हें ये अक्सर यहाँ पहन कर आते हैं और मुझे याद आता है कि अरे ये तो फलां चाचा थे या ये तो मेरी बुआ कि चमड़ी है अरे अभी कल ही तो मेरी मामी मुझसे इसी तरह मिलकर गई थी...... जाने दीजिये क़तार बहुत लम्बी है.
ग़नीमत है मेरी आत्मा इसके चंगुल मे नहीं पड़ी. इसका बस नहीं चला नहीं तो ये मेरी आत्मा भी बेच डालता. अगर ऐसा हो जाता तो एक शेर की आत्मा करोडो में बिकती.
इस इन्सान रुपी जानवर कि वजह से हम जानवरों को कहाँ - .कहाँ से निकला जाएगा शयद खुद इंसान को भी नहीं पता बस हर दम इस उम्मीद उम्मीद पर ज़िन्दा हूँ इस Museum में कि शायद ये मेरा आखिरी पड़ाव हो ..........-उफ़ ये इंसान
मैं अब जंगल में नहीं विश्व के संग्रहालयों में मिलता हूँ.
मुझसे मिलना हो तो जंगल मैं नहीं किसी संग्रहालय मे जाइए :)