गुरुवार, 5 मई 2011

मेरा पता अब बदल गया है

अरे !!! क्या आप मुझसे मिलना चाहते हैं ???

तो जनाब जंगलों में मुझे कहाँ खोज रहे हैं मैं तो यहाँ आराम से बैठा हूँ.आइये मुझसे मिलने के लिए आपको ज़्यादा कष्ट उठाने कि ज़रूरत नहीं है.बस एक दिन की छुट्टी का बलिदान और अपने पैरों को कष्ट देने की ज़रूरत है. हाय री किस्मत यही मेरा अंजाम था. मुझे अपने पर बड़ा नाज़ था. मुझसे मिलिकर कुछ खा पी कर जब ये आप शाम को अपने पैरों के दर्द के साथ ये सोचते हुए घर जाते हैं.......
"कि काश आज की छुट्टी मैंने घर पर सोते हुए या आराम से कोई फिल्म देखते हुए गुज़री होती तो कितना अच्छा होता".
तब मैं ये सोचता हूँ कि अरे जब जंगलों में मुझे ढूँढ़ते हुए भटकते हो तब ? अरे अभी तो मैं एक जगह ही खड़ा रहता हूँ अगर मैं सच में जंगल में होता तो ? पर वो जगह भी तो तुम्हारी वजह से मुझे छोडनी पड़ी. अब क्या मुझे इस घर से भी निकला जाएगा यहाँ से निकल कर मैं कहाँ जाऊंगा इस फ़िक्र में मुझे अब रातों में नींद भी नहीं आती मेरा क्या होगा समझ नहीं पा रहा हूँ.
आपके बच्चे मुझे देख कर खुश होते हैं और साथ ही आप भी कि बच्चों को मुझसे कोई डर नहीं है. ना मैं पंजा मार सकता हूँ, न दहाड़ सकता हूँ. मैं बस अपनी पथराई हुई आँखों से आप सबको चुप - चाप खड़ा देखता रहता हूँ. किसी को मुझसे मिलकर आश्चार्य होता है, तो कोई जोर से चिल्लाता है और कभी - कभी तो कोई सिर्फ मुस्कुरा कर रह जाता है. पर उसकी मुस्कुराहट से मुझे समझ में आ जाता है कि मैं बड़ा रजा बना घूमता था अब बस एक जगह खड़ा हूँ बिना हिले - डुले. आप लोगों को फोटो खिचवाने में कोई दिक्क़त ना हो इसीलिए ये सब करता हूँ. 
अरे आप लोगों को मेरे साथ फोटो भी तो खिचवाने हैं एक यही बात तो है जो आप सभी को बहुत पसंद है और सभी में एक जैसी है छोटे से लेकर बड़े तक.
अब मुझे ना खाने की चिंता है, ना दहाड़ने की और ना ही इंसान की. 
बस दिन रात आप लोगों को देखता रहता हूँ और सोचता रहता हूँ कि ये इंसान भी कितना अजीब है जब मैं जंगल मे रहता था तब भी इसे आराम नहीं थाऔर आज जब मैं यहाँ बैठा हूँ तब भी इसे आराम नहीं है.
जंगल में बिताये हुए दिनों कि यादें कभी कभी बहुत बेचैन कर देती हैं. कितने खूबसूरत दिन थे पर हाय री किस्मत इन इंसानों के हाथ चढ़ गया मुझे मारा सो मारा साथ ही मेरे जिस्म के हर हिस्से का पूरा उपयोग कर इसने मेरी खल में भूसा भर कर मेरी आँखों कि जगह कांच लगा कर यहाँ बैठा दिया और मेरे गोश्त को भून कर स्वाद से खा गया और उस पर तुर्रा ये की मेरे ही सामने मेरे गोश्त कि तारीफ करता है .मैं अगर इसका मांस कभी गलती से खा भी जाता था तो अफ़सोस होता था और एक ये है कि इसे किसी बात का अफ़सोस ही नहीं बेहया सारी शर्म को बेच कर खा गया है इंसान कहीं का.
कोई मेरे नाखूनों को गले में लटकाए घूम रहा है तो कोई मेरे रिश्तेदारों कि चमड़ी को घर में सजाये हुए है या उस पर बैठ रहा है. किसी किसी की चमड़ी के तो कपडे बनवा लिए जिन्हें ये अक्सर यहाँ पहन कर आते हैं और मुझे याद आता है कि अरे ये तो फलां चाचा थे या ये तो मेरी बुआ कि चमड़ी है अरे अभी कल ही तो मेरी मामी मुझसे इसी तरह मिलकर गई थी...... जाने दीजिये क़तार बहुत लम्बी है. 
ग़नीमत है मेरी आत्मा इसके चंगुल मे नहीं पड़ी. इसका बस नहीं चला नहीं तो ये मेरी आत्मा भी बेच डालता. अगर ऐसा हो जाता तो क शेर की आत्मा करोडो में बिकती. 
इस इन्सान रुपी जानवर कि वजह से हम जानवरों को कहाँ - .कहाँ से निकला जाएगा शयद खुद इंसान को भी नहीं पता बस हर दम इस उम्मीद उम्मीद पर ज़िन्दा हूँ इस Museum में कि शायद ये मेरा आखिरी पड़ाव हो ..........-उफ़ ये इंसान 
मैं अब जंगल में नहीं विश्व के संग्रहालयों में मिलता हूँ.

मुझसे मिलना हो तो जंगल मैं नहीं किसी संग्रहालय मे जाइए :)

6 टिप्‍पणियां:

  1. Bahut bahut khoob !!!! M looking forward for more n more!!!
    ‎'व्यथा'
    एक दहाड़ से जिसके थरथरा उठाता था पूरा वन..
    बड़ी बड़ी गुफाएँ उनकी, मदमस्त से करते थे विचरण...
    आज वो ही ' Save Tigers ' की छोटी छोटी जेलों में आश्रय ढून्ढ रहे हैं..
    हम ही ने किया शिकार और अब हम ही उन्हें ढून्ढ रहे हैं... Divya

    जवाब देंहटाएं
  2. Jungle ke raja ki ye vyatha ek baar fir mudde par sochane par majboor karti hai, jaha insaan ko apni taraqqi ke saamne kuchh bhi nahi soojhta. Aakhir hum kaun si nayi duniya basaana chah rahe hain ye ek bada sawaal kayi baar mujhe anant ki aur dekhne par majboor karta hai. Kya aap insaano ki is bhawana ko samajh paye hain. Agar aapke paas jawab ho to mujhe bhi zaroor bataayein..

    जवाब देंहटाएं
  3. vyatha se kahi adhik ye marti maanviya samvednaon ki kroor-katha hai.janwer ki peeda ko biographicaly likhna kathin hai lekin tumne badi sanjeedgi se kiya.badhaayee aur shukriya...likhti raho Astha...peeda ki bhasha har koie nahi samjhtaa....lv..tk cr.

    जवाब देंहटाएं
  4. Congratulations.
    Samvedansheel tippanion ke sang
    Samvedna jatate huye
    Sangrahalayon ke sankeerna ko
    Sacchai se pahachate huye
    Shukriya ada karta hoon
    ki aap ne blog kiya
    ek dahaad sunayi diya
    Shoonyata mein ek
    dard mehsoon hua
    iss 'aastha' ke saath
    ki aapke shabd uss
    nishabdta ka ehasaas dilayeinge....
    regards
    jai

    जवाब देंहटाएं
  5. Very well done....Excellent....
    A nice way to put forward your feelings against animal cruelty.
    Ise padhkar laga ki kash insaan janwar nahi, insaan hi hota.....

    जवाब देंहटाएं